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साल के दोना – पत्तलों ने भरी उड़ान यूरोपीय देशों के लिए

वनाश्रित परिवारों की आय में होगी उल्लेखनीय वृद्धि

बिलासपुर- भारतीय ग्रामीण जीवन की सामान्य पहचान साल के पत्तों से बने दोना, पत्तल अब यूरोप में अपनी मजबूत जगह बना रहे हैं। जरूरत अब वैज्ञानिक और संगठित तरीके से उपयोग की है ताकि ‘वन से विश्व बाजार तक’ की सफल यात्रा का प्रेरक मॉडल बन सके।

देश में सदियों से पत्तल और दोनों में भोजन देने की परंपरा रही है लेकिन बदलाव के दौर में प्लास्टिक और थर्मोकोल ने इस परंपरा को बेहद नुकसान पहुंचाया। अब एक बार फिर से पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में पत्तों से बने दोने और पत्तल विशेष पहचान बना रहे हैं। इसमें साल और सियाली के पत्तों से बनी यह सामग्री उल्लेखनीय है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से जैव अवक्रमणीय होते हैं।


हर भाग अहम

साल की लकड़ियां बेहद मजबूत होतीं हैं। आज भी इसका उपयोग गृह निर्माण में होता है। बीज नए पौधे तैयार करते हैं, तो निकलने वाली राल औषधिय निर्माण ईकाइयां खरीदती हैं। पत्तियों को विशेष रूप से इसलिए अहम माना जाता है क्योंकि यह बेहद मोटी होती है। मजबूती बेमिसाल मानी जाती है। अहम गुण यह कि जैव अवक्रमणीय होती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण ने इसका उपयोग सही माना है।


इसलिए बढ़ रही मांग

यूरोपीय देशों में सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग पर सख्त बंदिश है। पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के बाद प्राकृतिक उत्पादों की मांग में साल के पत्तों से बनी प्लेट, थाली, दोना और कटोरी के लिए भारतीय वनोत्पाद को बेहतर अवसर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इससे बनी सामग्री में रासायनिक कोटिंग नहीं होती। उपयोग के बाद आसानी से प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाती है। बेहद अहम इसलिए क्योंकि कार्बन फुट प्रिंट का काम करती है।


अवसर देश और प्रदेश के लिए

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लिए साल के पत्तों से बनी प्लेट, थाली, दोना और कटोरी की मांग यूरोपीय देशों में जिस अनुपात में बढ़ रही है, उसे देखते हुए अब पत्तियों की गुणवत्ता चयन, वैज्ञानिक ढंग से सिलाई, स्वच्छ पैकेजिंग तथा निर्यात मानकों के अनुरूप उत्पादन की जरुरत महसूस की जा रही है। शुरुआती प्रशिक्षण का ही परिणाम है कि अब निर्यात के द्वार खुल चुके हैं।

वर्जन
वनोपज को मूल्य संवर्धन से जोड़ने का समय

साल के पत्तों से बने दोना-पत्तल केवल पारंपरिक उत्पाद नहीं, बल्कि हरित अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका का सशक्त माध्यम हैं। यदि पत्तियों के वैज्ञानिक संग्रहण, गुणवत्ता आधारित चयन, स्वच्छ प्रसंस्करण, मानकीकृत सिलाई, आधुनिक पैकेजिंग तथा अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ सहित साल बहुल राज्यों के लाखों वनाश्रित परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। ‘वन से विश्व बाजार तक’ की इस यात्रा में अनुसंधान संस्थानों, स्वयं सहायता समूहों, वन समितियों और निर्यात एजेंसियों के समन्वित प्रयास भारत को पर्यावरण-अनुकूल प्राकृतिक उत्पादों का वैश्विक केंद्र बना सकते हैं।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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