क्या GPM में संविधान से विपरीत चल रहा प्रशासन? अलग-अलग फैसलों से उठे गंभीर सवाल

GPM में प्रशासन पर “पांच तरह के रवैये” के आरोप, कहीं सख्ती तो कहीं चुप्पी से बढ़ा आक्रोश
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM)।
जिले में इन दिनों प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। अलग-अलग मामलों में अलग-अलग प्रकार की कार्रवाई ने न केवल प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि अब यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या फैसले संविधान की भावना और तय नियमों के अनुरूप लिए जा रहे हैं या नहीं। स्थिति इस कदर संवेदनशील हो चुकी है कि मामला अब आंदोलन, चक्का जाम और न्यायालय तक पहुंच गया है।
तीन स्तरों पर बंटा प्रशासन, फैसलों में दिख रहा अंतर
जिले के हालिया घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि प्रशासनिक निर्णय तीन अलग-अलग स्तरों—कलेक्टर, जिला पंचायत CEO और जनपद पंचायत मरवाही—पर लिए जा रहे हैं, लेकिन इन फैसलों में एकरूपता की कमी साफ दिखाई दे रही है। यही असमानता अब विवाद का सबसे बड़ा कारण बन गई है।
कलेक्टर स्तर पर त्वरित कार्रवाई, लेकिन सवाल बरकरार
दो जनपद पंचायतों के CEO को हटाने की कार्रवाई कलेक्टर स्तर से की गई, जिसे प्रशासन की सख्ती के रूप में देखा गया। सूत्रों के अनुसार यह निर्णय जनप्रतिनिधियों की शिकायतों के आधार पर लिया गया। हालांकि, इसी के साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि जब कुछ मामलों में इतनी तेजी दिखाई गई, तो अन्य मामलों में उसी तरह की तत्परता क्यों नहीं दिखी।
इंजीनियर पर गंभीर आरोप, फिर भी कार्रवाई नहीं
मरवाही क्षेत्र में पदस्थ एक इंजीनियर के खिलाफ महिलाओं से दुर्व्यवहार, अभद्र व्यवहार, कार्यों में बाधा और कथित अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसके बावजूद अब तक किसी ठोस कार्रवाई का सामने न आना जनप्रतिनिधियों के बीच नाराजगी का कारण बन गया है। मरवाही सरपंच संघ ने इस मामले को लेकर आंदोलन की चेतावनी दी है।
सचिव निलंबन से भड़का विरोध, गौरेला में चक्का जाम की तैयारी
15वें वित्त आयोग से जुड़े मामले में 8 पंचायत सचिवों को निलंबित किए जाने से गौरेला क्षेत्र में असंतोष फैल गया है। सरपंच और सचिव संघ का आरोप है कि बिना निष्पक्ष और पूर्ण जांच के ही कार्रवाई कर दी गई। उनका कहना है कि जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है, उनके खिलाफ अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसी बीच एक और बड़ा सवाल सामने आ रहा है कि गौरेला के इस मामले में, जहां लगभग ₹1.20 करोड़ की राशि वेंडर के खाते में जाने की बात कही जा रही है, वहां अब तक FIR दर्ज क्यों नहीं हुई। यह मुद्दा अब जनचर्चा का विषय बन गया है।
मटियाडांड मामला: छोटी राशि में सख्ती, लेकिन सवाल बरकरार
मटियाडांड ग्राम पंचायत में ₹38 हजार के मामले में वेंडर के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में FIR दर्ज की गई और मामला न्यायालय में लंबित है। हालांकि, इस मामले में भी अन्य संबंधित पक्षों—सचिव, सरपंच और कंप्यूटर ऑपरेटर—की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि छोटी राशि के मामले में त्वरित FIR और सख्ती दिखाई गई, जबकि बड़े मामलों में वैसी ही कार्रवाई नहीं दिख रही।
सेखवा पंचायत में बड़े आरोप, लेकिन कार्रवाई का अभाव
इसके विपरीत, सेखवा ग्राम पंचायत में स्ट्रीट लाइट से जुड़े मामले में लाखों रुपये के कथित गबन के आरोप सामने आए हैं, लेकिन अब तक न तो FIR दर्ज की गई है और न ही किसी जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई हुई है। इस मामले ने प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
कटाक्ष भी बना चर्चा का विषय
इन विरोधाभासी कार्रवाइयों के बीच स्थानीय स्तर पर एक कटाक्ष भी चर्चा में है कि गौरेला के मामले की जांच यदि जनपद पंचायत मरवाही के सीईओ से कराई जाए, तो संभवतः त्वरित कार्रवाई और FIR दर्ज होने में देर नहीं लगेगी।
हालांकि यह केवल जनचर्चा और व्यंग्य के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इससे प्रशासन की कार्यशैली को लेकर लोगों की धारणा जरूर झलक रही है।
एक जिले में अलग-अलग मापदंड, बढ़ रहा असंतोष
इन सभी मामलों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि कहीं त्वरित कार्रवाई, कहीं निलंबन, कहीं FIR और कहीं पूरी चुप्पी देखने को मिल रही है। यही अंतर अब जनप्रतिनिधियों और कर्मचारियों के बीच असंतोष का मुख्य कारण बन गया है।
तीन मोर्चों पर बढ़ता दबाव
मौजूदा स्थिति में गौरेला में चक्का जाम, मरवाही में आंदोलन की तैयारी और एक CEO द्वारा हाईकोर्ट का रुख किए जाने से मामला और जटिल हो गया है। प्रशासन अब तीन मोर्चों पर एक साथ दबाव का सामना कर रहा है।
संघों की मांग: एक समान जांच और पारदर्शिता
सरपंच और सचिव संघ ने मांग की है कि सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो और एक समान मापदंड लागू किया जाए। उनका कहना है कि निर्दोषों पर कार्रवाई की समीक्षा होनी चाहिए और वास्तविक जिम्मेदारों पर सख्त कदम उठाए जाने चाहिए।
मटियाडांड मामला: अब न्यायालय में होगी भूमिका की पड़ताल
मटियाडांड पंचायत में ₹38 हजार के मामले में दर्ज FIR के बाद अब यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंच चुका है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रकरण में जनपद पंचायत मरवाही के तत्कालीन CEO विनय कुमार सागर की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है और आने वाले समय में न्यायालय में इस पूरे घटनाक्रम की विस्तार से समीक्षा हो सकती है।
संविधान और प्रशासनिक विश्वसनीयता पर उठे सवाल
लगातार सामने आ रहे इन विरोधाभासी फैसलों के बीच अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक निर्णय संविधान की भावना, कानून और तय प्रक्रियाओं के अनुरूप लिए जा रहे हैं। यदि एकरूपता और पारदर्शिता नहीं रही, तो इससे प्रशासनिक विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
प्रशासन का पक्ष अब भी स्पष्ट नहीं
इन सभी घटनाक्रमों के बीच जिला प्रशासन की ओर से अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन इन आरोपों और बढ़ते असंतोष के बीच क्या रुख अपनाता है।