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गौरेला में उप अभियंता पर कलेक्टर संरक्षण के गंभीर आरोप: शासन के दो-दो ट्रांसफर आदेश ठेंगा,12 साल से जमे, सिस्टम पर उठे बड़े सवाल

2013 से एक ही जगह पदस्थ, 2024 ट्रांसफर और 2025 एकपक्षीय रिलीव आदेश भी बेअसर—सूत्रों के हवाले से कलेक्टर से करीबी की चर्चा तेज

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में पदस्थ उप अभियंता वीरेंद्र बलभद्रे का मामला अब केवल एक ट्रांसफर विवाद नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करने वाला मामला बन गया है।
दस्तावेजों के अनुसार 27 जुलाई 2013 को विकास आयुक्त कार्यालय, छत्तीसगढ़ के आदेश से उन्हें ग्रामीण यांत्रिकी सेवा में उप अभियंता के रूप में जनपद पंचायत गौरेला (तत्कालीन जिला बिलासपुर) में पदस्थ किया गया था। तब से लेकर आज तक वे लगातार गौरेला-पेंड्रा क्षेत्र में ही जमे हुए हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वे इसी क्षेत्र के निवासी भी बताए जाते हैं, इसके बावजूद वर्षों तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहना न सिर्फ ट्रांसफर नीति के खिलाफ है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी सीधा सवाल खड़ा करता है।

शासन का आदेश… लेकिन ज़मीन पर शून्य पालन

24 अक्टूबर 2024 को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने उनका स्थानांतरण जनपद पंचायत कोटा, जिला बिलासपुर कर दिया। आदेश में साफ लिखा था कि यह तत्काल प्रभाव से लागू होगा और 10 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से कार्यमुक्त किया जाए।
लेकिन हकीकत यह रही कि आदेश फाइलों में ही दबा रह गया। सूत्रों के अनुसार महीनों तक न तो उन्हें कार्यमुक्त किया गया और न ही उन्होंने नए स्थान पर जॉइनिंग दी।

मंत्रालय का दूसरा आदेश भी बेअसर

मामला जब बढ़ा तो यह मंत्रालय स्तर तक पहुंचा। इसके बाद 1 जनवरी 2025 को एक और आदेश जारी हुआ, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए कि पूर्व ट्रांसफर आदेश के पालन में उन्हें एकपक्षीय रूप से रिलीव किया जाए।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस आदेश का भी कोई असर नहीं हुआ। उप अभियंता न केवल अपने पुराने स्थान पर बने रहे, बल्कि पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक स्तर पर भी कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई।

क्या कलेक्टर का संरक्षण बना ढाल?

सूत्रों के हवाले से सबसे बड़ा आरोप यही सामने आ रहा है कि उप अभियंता को जिला स्तर पर “संरक्षण” प्राप्त है। सूत्रों के अनुसार गौरेला पेंड्रा मरवाही कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी से उनकी प्रशासनिक नजदीकी की बात सामने आ रही है, जिसके चलते उनके खिलाफ कार्रवाई ठंडी पड़ी रही।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से शासन के दो-दो स्पष्ट आदेशों का पालन नहीं हुआ, उसने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

“सिस्टम से ऊपर” हो गया क्या एक उप अभियंता?

इस पूरे मामले ने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा कर दिया है—क्या एक उप अभियंता इतना प्रभावशाली हो सकता है कि राज्य शासन के आदेश भी उसके सामने बेअसर हो जाएं?
क्या जिला प्रशासन ने जानबूझकर आदेशों को रोके रखा? या फिर यह पूरा मामला “सेटिंग” और “मैनेजमेंट” का उदाहरण है?
नियमों की खुली अनदेखी या मिलीभगत?
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अधिकारी का एक ही स्थान पर इतने लंबे समय तक बने रहना नियमों के खिलाफ है। और जब ट्रांसफर आदेश जारी हो जाए, तब भी उसका पालन न होना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही या फिर सुनियोजित अनदेखी की ओर इशारा करता है।

स्थानीय स्तर पर बढ़ा आक्रोश

इस मामले को लेकर अब जनप्रतिनिधियों और विभागीय कर्मचारियों में भी नाराजगी बढ़ती जा रही है। लोगों का कहना है कि अगर एक अधिकारी के मामले में इस तरह नियमों को ताक पर रखा जाएगा, तो आम कर्मचारियों पर कार्रवाई का क्या औचित्य रह जाता है?

जांच की मांग, कार्रवाई पर सबकी नजर

अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है—और यही चुप्पी अब

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