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फर्जी प्रविष्टि का खेल, शासकीय जमीन पर कब्जा”: तहसीलदार अविनाश कुजूर के फैसले से फिर जिंदा हुआ बसंतपुर कांड

जंगल मद की जमीन को कागजों में निजी बनाकर खेला गया पूरा खेल

बिलासपुर/गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के पेंड्रा तहसील अंतर्गत ग्राम बसंतपुर की खसरा नंबर 1/44, रकबा 3.11 एकड़ जमीन अब एक बड़े राजस्व विवाद के केंद्र में है। “बड़े झाड़ जंगल मद” श्रेणी की इस शासकीय भूमि को कथित तौर पर अधिकार अभिलेख में फर्जी प्रविष्टि कर निजी संपत्ति में बदला गया और फिर सुनियोजित तरीके से लेन-देन की पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी गई।


अधिकार अभिलेख में कूट रचना: 99 के बाद ‘100 नंबर’ ने खोल दिया खेल
सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले की जड़ अधिकार अभिलेख (मिशल) में की गई कथित हेराफेरी है। मूल रिकॉर्ड में 1 से 99 तक ही प्रविष्टियां दर्ज थीं, लेकिन बाद में “100 नंबर” जोड़कर नई एंट्री कर दी गई। यही वह बिंदु है, जहां से शासकीय जमीन को निजी दिखाने का रास्ता तैयार हुआ।
दान, बिक्री और नामांतरण: एक ही स्क्रिप्ट के अलग-अलग किरदार
पहले 2020 में बिक्री, फिर 2022 में पति-पत्नी के बीच दान पत्र, और उसके बाद 2023 में तीसरे व्यक्ति को विक्रय—पूरा घटनाक्रम किसी तय स्क्रिप्ट की तरह आगे बढ़ता नजर आता है। कागजों में कीमत सीमित दिखाई गई, लेकिन सूत्रों के हवाले से दावा है कि वास्तविक सौदा इससे कहीं अधिक में हुआ।
शिकायत के बाद निरस्त नामांतरण, फिर कैसे हुआ बहाल?
20 मार्च 2023 को जब इस पूरे मामले की शिकायत हुई, तो तत्कालीन तहसीलदार ने नामांतरण निरस्त कर दिया था। इससे साफ हो गया था कि रिकॉर्ड में गड़बड़ी है और मामला गंभीर है।
लेकिन इसके बाद कहानी ने अचानक मोड़ लिया।
तहसीलदार अविनाश कुजूर के फैसले पर बड़ा सवाल
वर्तमान तहसीलदार अविनाश कुजूर द्वारा उसी जमीन का नामांतरण दोबारा कर दिया गया। यह वही प्रकरण है जिसे पहले निरस्त किया जा चुका था। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पहले की जांच गलत थी या फिर अब नियमों को दरकिनार कर फैसला लिया गया?
क्या नियमों की अनदेखी या ‘प्रभाव’ में लिया गया निर्णय?
राजस्व नियमों के मुताबिक किसी विवादित और निरस्त प्रकरण में दोबारा नामांतरण से पहले विस्तृत जांच और वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति आवश्यक होती है। ऐसे में बिना पारदर्शी प्रक्रिया के लिया गया यह निर्णय कई गंभीर संदेह खड़े करता है।
वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 2 का संभावित उल्लंघन
यदि यह जमीन वास्तव में “जंगल मद” श्रेणी की है, तो इसका हस्तांतरण और निजी स्वामित्व में बदलाव वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 के तहत प्रतिबंधित है। ऐसे में पूरा मामला केंद्रीय कानून के उल्लंघन की श्रेणी में भी आ सकता है।
जिला प्रशासन की चुप्पी: कार्रवाई या संरक्षण?
मामले की शिकायत जिला प्रशासन तक पहुंचने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना भी कई सवाल खड़े करता है। क्या यह लापरवाही है या फिर मामला जानबूझकर दबाया जा रहा है—यह जांच का विषय है।
‘गलती पर कार्रवाई नहीं, जिम्मेदारी में बढ़ोतरी’—बनती धारणा
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद तहसीलदार अविनाश कुजूर को अतिरिक्त जिम्मेदारी देते हुए दो तहसीलों का प्रभार दिया गया। इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं और यह संदेश जा रहा है कि जवाबदेही तय नहीं हो रही।
सरकारी रिकॉर्ड से खिलवाड़: बेहद गंभीर अपराध
अधिकार अभिलेख में फर्जी प्रविष्टि, कूट रचना कर जमीन की प्रकृति बदलना और फिर बिक्री की प्रक्रिया पूरी करना—यह सब भारतीय दंड संहिता और राजस्व कानूनों के तहत गंभीर अपराध है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो इसमें शामिल सभी जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई होना तय है।
अब नजर जांच पर: सच सामने आएगा या मामला दबेगा?
यह मामला सिर्फ एक जमीन का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता का है। अब देखना होगा कि क्या इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच होती है या फिर यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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