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300 वर्षों के बाद तर्क और विज्ञान का आधार पर स्थापित है पौष्पी पाणिनिप्रक्रिया : प्रो० श्रीनिवास वरखेड़ी

बिलासपुर ।, पाणिनीय शोध संस्थान के सभागार में आज “पौष्पी पाणिनिप्रक्रिया का विश्वपरिचय एवं विद्वत्सम्मान” विषयक परिचर्चा का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रातः 10:30 बजे आरम्भ हुए इस कार्यक्रम ने संस्कृत जगत के विद्वानों, छात्रों और संस्कृति प्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक बटुकों के मंत्रोच्चारण और माननीय अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। मंगलाचरण की पवित्र ध्वनि ने वातावरण को आध्यात्मिकता से परिपूर्ण कर दिया। संस्थान की अध्यक्षा प्रो० पुष्पा दीक्षित ने वाचिक स्वागत करते हुए अतिथियों का अभिनन्दन किया। इसके पश्चात् मुख्य अतिथि प्रो० श्रीनिवास वरखेड़ी (कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली), सारस्वत आतिथि प्रो० राधावल्लभ त्रिपाठी (पूर्व कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय) तथा संरक्षक एवं विशिष्ट अतिथि श्री अमर अग्रवाल (वरिष्ठ विधायक एवं पूर्व मन्त्री, छत्तीसगढ़ शासन) का पुष्पगुच्छ एवं अभिनन्दन पत्र भेंट कर सम्मान किया गया। इसके बाद प्रो० पुष्पा दीक्षित ने विषय प्रवर्तन करते हुए पाणिनिप्रक्रिया की वैश्विक प्रासंगिकता पर विस्तृत विचार रखे। उन्होंने बताया कि पाणिनि का व्याकरण आधुनिक भाषाविज्ञान और कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स तक में उपयोगी है।


प्रो० ब्रजभूषण ओझा (वाराणसी) और प्रो० विष्णुकान्त पाण्डेय (जयपुर) को पण्डितराज विद्वत्सम्मान से अलंकृत किया गया। इसके बाद प्रो० राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा रचित ग्रन्थ “संस्कृत की विदुषियाँ एवं महिलायें” का लोकार्पण हुआ। यह ग्रन्थ संस्कृत साहित्य में महिलाओं के योगदान को रेखांकित करता है।
संरक्षक एवं विशिष्ट अतिथि श्री अमर अग्रवाल ने संस्कृत भाषा की महत्ता और शिक्षा जगत में इसके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। प्रो० राधावल्लभ त्रिपाठी ने सारस्वत उद्बोधन में संस्कृत की वैज्ञानिकता और विश्व में उसकी स्वीकार्यता पर गहन विचार प्रस्तुत किए। वहीं प्रो० ब्रजभूषण ओझा और प्रो० विष्णुकान्त पाण्डेय ने विद्वत्सम्बोधन में पाणिनीय व्याकरण की सूक्ष्मताओं और उसके आधुनिक परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में संस्थान के छात्रों ने अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत किए, जिनमें संस्कृत अध्ययन की चुनौतियों और अवसरों पर विचार रखे गए। मुख्य अतिथि प्रो० श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने उद्बोधन में कहा कि संस्कृत भाषा और पाणिनीय परम्परा को आधुनिक तकनीकी साधनों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने संस्थान के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि डिजिटल युग में संस्कृत को पुनः प्रतिष्ठित करना सम्भव है।
कार्यक्रम के अंत में श्री चन्द्रप्रकाश वाजपेयी (सचिव, पाणिनीय शोध संस्थान) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुये सभी अतिथियों, विद्वानों एवं छात्रों का आभार व्यक्त किया एवं डॉ. अभिजित् दीक्षित द्वारा मंच का कुशल संचालन किया गया।
इस परिचर्चा ने स्पष्ट किया कि पाणिनिप्रक्रिया केवल भारतीय परम्परा का गौरव नहीं, बल्कि विश्व भाषाविज्ञान का आधारस्तम्भ है। विद्वानों के विचारों ने संस्कृत भाषा की महत्ता को पुनः स्थापित किया और विद्वत्सम्मान की परम्परा को जीवित रखा। “पौष्पी पाणिनिप्रक्रिया का विश्वपरिचय एवं विद्वत्सम्मान” परिचर्चा ने संस्कृत जगत को नई दिशा प्रदान की और भारतीय संस्कृति की अमर ज्योति को पुनः प्रज्वलित किया।

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