कांक्रीट, कांच,लोहा और टाईल्स ने बिगाड़ा ताप संतुलन

याद आ रही मिट्टी आधारित भवन प्रणाली
बिलासपुर- ग्रेनाइट, सेरेमिक टाईल्स, लोहे और कांच जैसी सामग्रियों ने भवनों को आकर्षक और टिकाऊ तो बनाया लेकिन तापमान नियंत्रण की प्राकृतिक क्षमता घटा दी। फलस्वरुप अब रातें भी बेहद गर्म होने लगीं हैं।
कच्चे घरों में गर्मी कम लगती है, यह अब केवल अनुभव ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से सत्य प्रमाणित हो चुका है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन, हीट वेव, बढ़ते तापमान और झुलसते जीवन के बीच, आज भी कच्चे मकान, कच्चे फर्श अपेक्षाकृत ठंडा महसूस करा रहे हैं।

ऊष्मा का अधिक अवशोषण
सेरेमिक टाईल्स, मार्बल और कांक्रीट। सूर्य की किरणों को तेजी से अवशोषित करते हैं और लंबे समय तक गर्मी को संचित करके रखते हैं। विशेष कर गहरे रंग की टाईल्स, छायाविहीन भवनों में यह गर्मी ज्यादा महसूस की जाती है। हीट ट्रैप का प्रभाव तब और अधिक बढ़ता है, जब कम वेंटिलेशन और कांच की खिड़कियों की संख्या ज्यादा होती है। यह स्थिति गर्मी को अंदर ही बनाए रखती है। ऐसे भवनों में रातें इसलिए गर्म रहतीं हैं क्योंकि टाइल्स और लोहे तथा कांच सारा दिन अपने में ऊष्मा जमा करते हैं और यह जमी गर्मी रात में धीरे-धीरे छोड़ते हैं।

-बनाते हैं अर्बन हीट आईलैंड
सेरेमिक टाईल्स, कांच की खिड़कियां, लोहे का बढ़ता उपयोग और कम हरियाली, सीमेंट और डामर की सड़क साथ मिलकर वाहन तथा एयर कंडीशनर के सहयोग से तापमान बढ़ाते हैं और यही स्थितियां अर्बन हीट आईलैंड के नाम से पहचानी जातीं हैं, जो तेजी से विस्तार ले रही है।

मिट्टी है नेचुरल इंसुलेटर
मिट्टी एक प्राकृतिक इंसुलेटर है। यह गुण बाहरी गर्मी को तेजी से अंदर आने और गर्मी का प्रवाह रोकता है। पारंपरिक मिट्टी घरों में दीवारें मोटी होतीं थीं। खिड़कियां लोहे और कांच की बजाय लकड़ियों से बनाई जाती थी। इसमें ऊंचाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। यह संरचना गर्म हवा को ऊपर ही रोकती थीं और भीतरी हिस्से में तापमान का स्तर संतुलित बनाए रखने में मदद करती थी। वाष्पीकरण की प्रक्रिया इसलिए अहम मानी गई है क्योंकि वातावरण से ऊष्मा लेकर न केवल घर को ठंडा रखती थी बल्कि आसपास का वातावरण भी ठंडा रहता था।
-होते हैं सूक्ष्म छिद्र
मिट्टी में छोटे-छोटे सूक्ष्म छिद्र होते हैं, इनमें नमी लंबे समय तक बनी रहती है। जब तापमान बढ़ता है, तब यह नमी धीरे-धीरे वाष्पित होती है। इसी कारण मिट्टी के फर्श पर चलने से ठंडक महसूस होती है। यही ठंडक अर्बन हीट आईलैंड बनने से रोकती है।
वर्जन
प्रकृति आधारित निर्माण ही भविष्य का समाधान
तेजी से बढ़ते तापमान और हीट वेव की परिस्थितियों में पारंपरिक मिट्टी आधारित भवन प्रणाली आज फिर प्रासंगिक साबित हो रही है। आधुनिक भवनों में अत्यधिक कांक्रीट, कांच, लोहे और टाइल्स के उपयोग ने प्राकृतिक ताप संतुलन को प्रभावित किया है। यदि शहरों और गांवों में स्थानीय सामग्री, हरित आवरण, प्राकृतिक वेंटिलेशन तथा वृक्ष आधारित भवन डिजाइन को बढ़ावा दिया जाए, तो अर्बन हीट आईलैंड के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में नेचर बेस्ड हाउसिंग केवल परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता बनती जा रही है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर