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‘मोर गांव- मोर पानी’ जल संरक्षण का बलरामपुर मॉडल बना प्रदेश के लिए प्रेरणा

-वर्षा जल संचयन, सोख्ता गढ्ढों और जन भागीदारी से भूजल संवर्धन की नई राह

बिलासपुर- ‘वर्षा जल को रोकना ही, भविष्य को संजोना है। मोर गांव मोर पानी’जैसे सब संकल्प को लेकर चल रहा छत्तीसगढ़ का बलरामपुर जिला अब पूरे प्रदेश के लिए जल संरक्षण का नया मॉडल बनकर उभर रहा है।

जल संकट का समाधान केवल बड़े बांध और बड़ी परियोजनाओं में नहीं बल्कि गांव स्तर पर सभी की भागीदारी और स्थानीय जल प्रबंधन में ही निहित है। छत्तीसगढ़ में नया अभियान, जल निर्भरता की राह इसलिए आसान करेगा क्योंकि बलरामपुर मॉडल अब पूरे प्रदेश की नजर में आ चुका है। हर खेत में वर्षा जल संचय के लिए सोख्ता गड्ढा बनाकर जिले में जल उपयोगिता समिति के जरिए पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार व सामुदायिक जल संरचनाएं फिर से आकार लेने लगीं हैं।


इसलिए मोर गांव- मोर पानी

नदियों, तालाबों और जलाशयों वाले छत्तीसगढ़ में औसत बारिश 1200 से 1400 मिली मीटर होती है। इसके बावजूद पेय जल और सिंचाई जल संकट जैसी स्थितियां बनतीं हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि हमारा प्रदेश जल संरक्षण के उपाय में गंभीर नहीं है। इसके अलावा वर्षा जल का तीव्र अपवाह तथा पारंपरिक जल स्रोत का लगातार क्षरण के साथ तालाबों तथा जलाशयों का अतिक्रमण जैसे हालात मुख्य वजह माने जा रहे हैं जल संकट के लिए। यह स्थितियां घटते भूजल को और भी गंभीर बना रहीं हैं।


क्या है मोर गांव- मोर पानी?

‘मोर गांव- मोर पानी’ एक सामुदायिक जल संरक्षण अभियान है। योजना के तहत गांव में सोख्ता गढ्ढों का निर्माण, खेत, तालाबों का विकास, चेक डैम निर्माण, कंटूर ट्रैचिंग, परंपरागत जल स्रोतों का पुनर्जीवन और जल स्रोतों का पुनर्जीवन जैसे काम न केवल हाथ में लिए जाएंगे बल्कि पूरी गंभीरता के साथ उन्हें पूरा भी किया जाएगा। इस काम से पेयजल संकट दूर तो होगा ही, ग्रामीण क्षेत्रों में सूखे दिनों में पर्याप्त जल उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद भी मिलेगी।


बलरामपुर मॉडल

‘मोर गांव- मोर पानी’ अभियान में उत्तरी छत्तीसगढ़ का बलरामपुर जिला पूरे प्रदेश के लिए अग्रणी उदाहरण बनकर उभरा है। इस जिले के किसानों ने अपने-अपने खेतों में सोख्ता गढ्ढों का निर्माण किया है। बारिश के दिनों में नदी- नालों में व्यर्थ बहकर जाने वाला पानी अब इन गढ्ढों में जा रहा है। इससे भूजल स्तर बढ़ते क्रम पर है। यह कुओं और हैंड पंपों में पर्याप्त जल भंडार बनाए रखे हुए हैं, तो सूखे की स्थिति में मिट्टी में नमी बनाए रखती है। यह नमी फसलों को राहत देती है।

वर्जन
जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाना समय की मांग

मोर गांव-मोर पानी जैसी पहल केवल जल संरक्षण अभियान नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन की मजबूत रणनीति हैं। वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर रोककर भूजल पुनर्भरण बढ़ाया जा सकता है, जिससे पेयजल, सिंचाई और वानिकी गतिविधियों को दीर्घकालिक लाभ मिलता है। बलरामपुर मॉडल यह साबित करता है कि यदि गांव स्तर पर जनभागीदारी, जल संरचनाओं का पुनर्जीवन और वृक्षारोपण को एक साथ जोड़ा जाए, तो जल संकट का प्रभावी समाधान संभव है। भविष्य की जल सुरक्षा के लिए हर गांव को ‘बारिश का पानी बचाएं, भूजल सुरक्षित करें‘ के सिद्धांत पर कार्य करना होगा।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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