प्रतिबंध फिर भी ‘करील’ की आवक
गौरेला, पेंड्रा, मरवाही, कटघोरा,पाली और बारनवापारा अभ्यारण्य से आ रहा

बिलासपुर- 80 से 150 रुपए किलो। बांस की नई कोंपल याने करील के दाम दोगुने हो सकते हैं क्योंकि सख्त बंदिश है इसकी कटाई पर। इसलिए चोरी-छिपे कटाई और सब्जी बाजार में इसकी पहुंच हो रही है।
जून मध्य से अगस्त अंत तक की अवधि अनुकूल मानी जाती है बांस में नई कोंपलों के लिए। प्राकृतिक पुनर्जनन और बांस के नए जंगल को विस्तार देतीं हैं यह कोंपल लेकिन सब्जी के रूप में उपयोग के बाद विस्तार की कोशिशों को लग रहा है झटका। इसलिए इस अवधि में कोंपल याने करील की कटाई पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है लेकिन आ रहा करील यह प्रमाणित कर रहा है अवैध कटाई बेखौफ जारी है।

भविष्य का बांस है करील
जून मध्य से अगस्त अंत के अंतराल में बांस के झुरमुट में नई कोंपलें निकलतीं हैं। बेहद कोमल होती हैं यह कोंपलें। यह अवस्था बांस के प्राकृतिक पुनर्जनन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होतीं हैं। सुरक्षा के घेरे में रखे जाने पर यह कोंपल बांस के नए जंगलों के विस्तार में सहायक बनती है लेकिन अवैध कटाई की वजह से विस्तार प्रभावित होने की वजह से करील कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

यहां से आ रहा करील
पड़ोस के गौरेला, पेंड्रा, मरवाही, पाली और कटघोरा के वनांचलों के साथ बलोदा बाजार के बारनवापारा अभ्यारण्य के करील की चोरी- छिपे आवक सब्जी बाजार में होने की खबर है। मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ता अंतराल 80 से 150 रुपए किलो की जगह दोगुना से आगे बढ़ा सकता है।

गुणवत्ता पर संदेह
करील का प्राकृतिक रंग धूसर होता है। कटाई के बाद इसकी उम्र एवं ताजगी बेहद सीमित हो जाती है। अधिक समय तक ताजा और सफेद नजर आए इसके लिए करील को चूने के घोल में डुबोया जाता है। यह क्रिया खतरनाक हो सकती है। यह रासायनिक करील सेवन के योग्य है या नहीं ? इसकी जांच की मांग वानिकी वैज्ञानिक कर रहे हैं।
वर्जन
करील की हर कोंपल, बांस के भविष्य की नींव
बांस की नई कोंपलें केवल सब्जी नहीं, बल्कि बांस के प्राकृतिक पुनर्जनन की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वर्षा ऋतु में निकलने वाली इन कोमल कोंपलों की अनियंत्रित कटाई से बांस के नए पौधों की स्थापना और भविष्य के बांस वन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए प्रतिबंधित अवधि में करील की आवक यह संकेत देती है कि निगरानी और अवैध कटाई पर नियंत्रण को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर