अल नीनो की दस्तक, संकट में धान की खेती

कमजोर मानसून, अल्प बारिश और लंबी शुष्क अवधि के संकेत
इवनिंग टाइम्स
बिलासपुर- अल्प अवधि में तैयार होने वाली धान की प्रजातियों का चयन करें। फसल विविधीकरण जैसे उपायों पर गंभीरता के साथ काम करना होगा। वर्षा जल संरक्षण के लिए खेत, तालाब, मेड़बंदी और सूक्ष्म सिंचाई जैसी पद्धति के लिए तैयारी अभी से करनी होगी।

प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भाग की समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि देखी जाने लगी है। यह स्थिति वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर सकता है। अल नीनो के नाम से पहचानी जाने वाली इस स्थिति के बाद भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने कमजोर मानसून, कमजोर बारिश के साथ लंबी शुष्क अवधि की आशंका जाहिर कर दी है।

कमजोर शुरुआत मानसून की
प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भाग में जिस रूप से अल नीनो सक्रिय है, इसका पहला असर मानसून की कमजोर शुरुआत के रूप में सामने आ सकता है। कुल बारिश की मात्रा में कमी की आशंका है। धीमी शुरुआत शुष्क दिनों की संख्या में वृद्धि करेगी। इससे तापमान में जोरदार वृद्धि की आशंका प्रबल है। यह फसलों में नमी तनाव जैसी संकट ला सकती है।

धान की रोपाई पर संकट
अल नीनो की सक्रियता जून-जुलाई में भी बनी रहने की आशंका है। इसकी वजह से नर्सरी में पौधों की बढ़वार कमजोर हो सकती है। यह स्थिति रोपाई में विलंब की वजह बन सकती है। सीधा असर फसल उत्पादन पर निश्चित रूप से पड़ेगा क्योंकि सभी काम विलंब से होंगे। आर्थिक नुकसान उठाना होगा किसानों को क्योंकि वर्षा कमजोर रहने की धारणा प्रबल है।

जल भंडार दबावों में
अल्प बारिश जैसी स्थितियां जलाशय एवं भूजल स्त्रोत पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। यह कमजोर भंडारण जैसे रूप में देखा जाएगा। सीमित उपायों के बीच खेत, तालाब, मेड़ बंधान के साथ सूक्ष्म सिंचाई प्रबंधन की तैयारी किसानों को रखने की सलाह कृषि वैज्ञानिक दे रहे हैं ताकि नुकसान का प्रतिशत कम किया जा सके।
शुरू हुआ खेत बचाओ अभियान
अल नीनो की सक्रियता के बाद केंद्र सरकार ने ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत 1 जून से कर दी है। इसके तहत वर्षा आधारित जिलों के लिए वैकल्पिक फसलों का चयन, अल्प अवधि में तैयार होने वाली धान की प्रजातियों की बोनी, फसल विविधीकरण जैसे उपायों के साथ रासायनिक उर्वरकों की बजाय जैविक खाद, हरी खाद, वर्मी कंपोस्ट जैसे खाद का उपयोग बढ़ाने की सलाह जारी की जा रही है।
वर्जन
छत्तीसगढ़ के लिए चुनौतीपूर्ण संकेत
अल नीनो की सक्रियता छत्तीसगढ़ जैसे वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों के लिए चुनौतीपूर्ण संकेत है। यदि मानसून की शुरुआत कमजोर रहती है और वर्षा में लंबे अंतराल आते हैं, तो धान आधारित खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में किसानों को अल्प अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों का चयन करना चाहिए तथा फसल विविधीकरण को अपनाना चाहिए। वर्षा जल संरक्षण के लिए खेत-तालाब, मेड़बंदी, मल्चिंग और सूक्ष्म सिंचाई जैसी तकनीकों की तैयारी अभी से करना आवश्यक है। साथ ही जैविक खाद, हरी खाद एवं वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से मिट्टी की नमी धारण क्षमता बढ़ाई जा सकती है। समय रहते अपनाए गए ये उपाय संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
डॉ. एस.आर.पटेल, रिटायर्ड प्रोफेसर (एग्रोनॉमी), इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर