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गेड़ी की मस्ती, नारियल फेंक और पारंपरिक खेलों में दिखा उत्साह,कृषि औजारों की पूजा के साथ मनाई गई हरेली

पुष्य नक्षत्र के शुभ संयोग में घर-घर हुई भगवान शिव और प्रकृति की पूजा

गुरहा-चीला व सोहारों की महकी खुशबू,

शहरभर में हुए विभिन्न आयोजन

बिलासपुर। सावन की अमावस्या पर बुधवार को छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और प्रमुख लोकपर्व हरेली पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। शहर से लेकर गांवों तक हरेली के रंग में लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और प्रकृति प्रेम का संगम देखने को मिला। युवाओं और बच्चों ने गेड़ी चढ़कर उत्सव मनाया, वहीं नारियल फेंक, पिठ्ठल, गेड़ी दौड़, रस्सी खींच और कुर्सी दौड़ जैसी पारंपरिक खेल प्रतियोगिताओं में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
घर-घर में गुरहा-चीला, सोहारी सहित पारंपरिक पकवान बनाए गए। किसानों ने अपने कृषि औजारों की पूजा-अर्चना की और अच्छी फसल तथा सुख-समृद्धि की कामना की। सावन अमावस्या होने के कारण शहर के विभिन्न शिव मंदिरों में भी भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना की गई।

पुष्य नक्षत्र में मनाया गया हरेली पर्व

इस वर्ष हरेली का पर्व धार्मिक दृष्टि से भी विशेष रहा। श्रावण अमावस्या तिथि 11 अगस्त की देर रात 1.54 बजे शुरू होकर 12 अगस्त की रात 11.07 बजे तक रही। उदयातिथि के अनुसार हरेली का मुख्य पर्व 12 अगस्त को मनाया गया।

पर्व के दिन पुष्य नक्षत्र रहा और चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में स्थित रहे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ग्रहों की इस स्थिति से गौरी और गजकेसरी योग का निर्माण हुआ। इसके चलते हरेली पर पूजा-पाठ, स्नान और दान को विशेष शुभ माना गया।

पीतांबरा पीठ के पीठाधीश्वर आचार्य दिनेश महाराज के अनुसार हरेली पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान का विशेष महत्व रहा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4.23 से 5.06 बजे तक रहा। इसके अलावा चर मुहूर्त सुबह 5.38 से 7.20 बजे, लाभ मुहूर्त 7.20 से 9.03 बजे, अमृत मुहूर्त 9.03 से 10.45 बजे और शुभ मुहूर्त दोपहर 12.27 से 2.10 बजे तक रहा।

शिवालयों में हुई विशेष पूजा, पौधरोपण भी किया

हरेली के अवसर पर शहर के शिव मंदिरों में दिनभर विशेष पूजा-अनुष्ठान हुए। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का अभिषेक किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। श्रावण अमावस्या के चलते पितरों के निमित्त तर्पण भी किया गया।

इसके अलावा विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। व्यंकटेश मंदिर के महंत डॉ. कौशलेंद्र प्रपन्नाचार्य ने बताया कि हरेली पर शिव-पार्वती पूजन के साथ तुलसी, आम, बरगद और नीम जैसे पौधे लगाने की परंपरा रही है। इससे देव और पितरों की प्रसन्नता के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी मिलता है।

कोन्हेर गार्डन से अभिलाषा परिसर तक आयोजन

हरेली के अवसर पर शहर में विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। हरिहर ऑक्सीजोन की ओर से सुबह 7 बजे कोन्हेर गार्डन में हरेली उत्सव मनाया गया। वहीं शाम 4 बजे तिफरा स्थित अभिलाषा परिसर में दिव्यांग बच्चों के साथ हरेली का पर्व मनाया गया। यहां गीत-संगीत सहित विभिन्न कार्यक्रम हुए।

जूना बिलासपुर, चांटीडीह सहित शहर के अलग-अलग मोहल्लों में भी हरेली की धूम रही। बच्चों और युवाओं की टोलियां गेड़ी पर नजर आईं। कई स्थानों पर नारियल फेंक, पिठ्ठल, गेड़ी दौड़, रस्सी खींच और कुर्सी दौड़ जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं।

हरेली में दिखा संस्कृति, धर्म और विज्ञान का समावेश

हरेली केवल कृषि और लोकपरंपरा का पर्व नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति, स्वास्थ्य और विज्ञान से जुड़ी परंपराएं भी शामिल हैं। बारिश के मौसम में घरों में नमी और कीट-पतंगों की समस्या बढ़ जाती है। ऐसे में परंपरागत रूप से नीम की छाल दरवाजे पर लगाने की परंपरा रही है। नीम के औषधीय गुणों के कारण इसे संक्रमण और कीटों से बचाव से जोड़ा जाता है।

इसी तरह पुराने समय में घर के दरवाजे पर लोहे की कील लगाने की परंपरा भी रही। इसे बारिश और आकाशीय बिजली के समय सुरक्षा से जुड़ी लोकमान्यता के रूप में देखा जाता है। हालांकि आधुनिक समय में बिजली गिरने से बचाव के लिए वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तड़ित सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग अधिक प्रभावी है।

हरेली पर गोबर के छेने में लोहबान और गुग्गल डालकर हवन करने की परंपरा भी रही है। वहीं कृषि कार्य के एक चरण के पूरा होने के बाद किसान अपने हल, फावड़ा, कुदाल और अन्य कृषि उपकरणों को साफ कर उनकी पूजा करते हैं और उन्हें सुरक्षित रखते हैं।

सूर्यग्रहण के बावजूद नहीं लगा धार्मिक प्रतिबंध

12 अगस्त को वर्ष का अंतिम पूर्ण सूर्यग्रहण भी हुआ, लेकिन यह भारत में दिखाई नहीं दिया। इस वजह से यहां सूतक काल मान्य नहीं रहा और मंदिरों में पूजा-पाठ, आरती, अभिषेक, भोग और दर्शन नियमित रूप से होते रहे।

व्यंकटेश मंदिर के महंत डॉ. कौशलेंद्र प्रपन्नाचार्य ने बताया कि शास्त्रीय मान्यता के अनुसार सूतक उसी स्थान पर माना जाता है, जहां ग्रहण दिखाई देता है। भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देने के कारण धार्मिक अनुष्ठानों पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं रहा। मंदिरों के कपाट भी सामान्य समय पर खुले और बंद हुए।
इस तरह हरेली के अवसर पर बिलासपुर में लोकपरंपरा, कृषि संस्कृति, धार्मिक आस्था, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक खेलों का अनूठा संगम देखने को मिला। गेड़ी की मस्ती और पारंपरिक खेलों से लेकर शिव पूजा और पौधरोपण तक, पूरे शहर में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति की झलक दिखाई दी।

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