छत्तीसगढ़ चुनेगा अपनी पहली राजकीय तितली: जैव विविधता संरक्षण में जनभागीदारी की नई उड़ान

बिलासपुर – छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध जैव विविधता के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने जा रहा है। राज्य सरकार ने पहली बार राज्य की राजकीय तितली घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की है और इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अंतिम चयन में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित की गई है। नागरिकों को विभिन्न तितली प्रजातियों में से अपनी पसंद के लिए मतदान करने का अवसर दिया गया है। मतदान 31 अगस्त 2026 तक खुला रहेगा। यह पहल केवल एक राजकीय प्रतीक चुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने का एक अभिनव प्रयास भी है।

तितली क्यों है महत्वपूर्ण?
तितलियाँ प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक होने के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इन्हें जैव संकेतक माना जाता है, क्योंकि किसी क्षेत्र में तितलियों की विविधता और संख्या वहाँ के पर्यावरणीय स्वास्थ्य का संकेत देती है। यदि किसी वन, घासभूमि या कृषि क्षेत्र में तितलियाँ प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं, तो यह उस क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमाण होता है।
तितलियाँ अनेक वनस्पतियों के परागण में योगदान देती हैं और पक्षियों, मकड़ियों तथा अन्य जीवों के लिए भोजन का भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसलिए इनका संरक्षण सम्पूर्ण जैव विविधता के संरक्षण से जुड़ा हुआ है।

छत्तीसगढ़ की समृद्ध तितली विविधता
लगभग 44 प्रतिशत वन क्षेत्र वाले छत्तीसगढ़ में घने साल वन, मिश्रित वन, बाँस वन, पर्वतीय क्षेत्र, नदी घाटियाँ और मैदानी भू-भाग तितलियों के लिए आदर्श आवास उपलब्ध कराते हैं। राज्य के बस्तर, कांकेर, गरियाबंद, सरगुजा, गुरु घासीदास-तमोर पिंगला परिदृश्य तथा अचानकमार टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्र तितलियों की अनेक दुर्लभ एवं आकर्षक प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
भारत में लगभग 1,300 से अधिक तितली प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं, जिनमें से बड़ी संख्या मध्य भारत और छत्तीसगढ़ के वनों में पाई जाती है। राज्य में कॉमन जेज़ेबेल, कॉमन मॉर्मन, ब्लू टाइगर, लाइम बटरफ्लाई, कॉमन क्रो, प्लेन टाइगर, कॉमन रोज़, कॉमन ग्रास येलो जैसी अनेक प्रजातियाँ नियमित रूप से देखी जाती हैं।
जनता की भागीदारी क्यों महत्वपूर्ण है?
पहली बार किसी राजकीय प्रतीक के चयन में आम नागरिकों को मतदान का अवसर देना लोकतांत्रिक सहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे नागरिक केवल दर्शक नहीं रहेंगे, बल्कि जैव विविधता संरक्षण अभियान के सक्रिय भागीदार बनेंगे।
विशेष रूप से विद्यालयों, महाविद्यालयों और प्रकृति प्रेमियों के बीच तितलियों के अध्ययन, फोटोग्राफी तथा संरक्षण के प्रति रुचि बढ़ेगी। इससे भविष्य में “सिटिजन साइंस” कार्यक्रमों को भी बल मिलेगा।
राजकीय तितली बनने के संभावित लाभ
राजकीय तितली घोषित होने के बाद संबंधित प्रजाति को व्यापक पहचान मिलेगी। इसके संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम संचालित किए जा सकते हैं। विद्यालयों के पाठ्यक्रम, प्रकृति शिक्षा शिविरों, जैव विविधता उद्यानों तथा इको-टूरिज्म गतिविधियों में इसे प्रमुखता से शामिल किया जा सकेगा।
इसके अतिरिक्त तितली उद्यान, परागण उद्यान तथा स्थानीय पुष्पीय वनस्पतियों के संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
कृषि और तितलियाँ
तितलियाँ केवल वन क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं। कृषि पारिस्थितिकी में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। विविध पुष्पीय पौधों की उपस्थिति तितलियों को आकर्षित करती है, जिससे परागण में सहायता मिलती है। जैविक खेती, कम रासायनिक कीटनाशक उपयोग तथा कृषि-वनीकरण जैसी प्रणालियाँ तितलियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती हैं।
संरक्षण की प्रमुख चुनौतियाँ
वर्तमान समय में तितलियों के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं—
- प्राकृतिक आवासों का लगातार क्षरण।
- अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग।
- जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और वर्षा चक्र में परिवर्तन।
- शहरीकरण एवं वन खंडित होना।
- विदेशी आक्रामक पौधों का प्रसार।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्रों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। सामुदायिक सहभागिता, स्थानीय पौधों का रोपण तथा पर्यावरण शिक्षा आवश्यक होगी।
अन्य राज्यों से सीख
भारत के कई राज्यों ने पहले ही अपनी राजकीय तितली घोषित कर संरक्षण प्रयासों को नई दिशा दी है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र ने ब्लू मॉर्मन, उत्तराखंड ने कॉमन पीकॉक तथा जम्मू-कश्मीर ने ब्लू पैंसी को राजकीय तितली का दर्जा दिया है। अब छत्तीसगढ़ भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा रहा है।
छत्तीसगढ़ के लिए इसका व्यापक महत्व
छत्तीसगढ़ पहले से ही अपने राजकीय पशु (वन भैंसा), राजकीय पक्षी (पहाड़ी मैना), राजकीय वृक्ष (सरई), राजकीय पुष्प (गेंदा) और राजकीय मछली के लिए जाना जाता है। अब राजकीय तितली का चयन राज्य की प्राकृतिक विरासत को और समृद्ध करेगा तथा जैव विविधता संरक्षण को नई पहचान देगा।
प्रकृति के प्रति समाज की सामूहिक जिम्मेदारी
राजकीय तितली का चयन केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि इस अभियान के माध्यम से नागरिकों, विद्यार्थियों और किसानों में तितलियों तथा उनके आवासों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो इसका लाभ सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को मिलेगा।
छत्तीसगढ़ की यह पहल देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकती है। यह संदेश स्पष्ट है कि जैव विविधता का संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। जब जनता स्वयं अपनी राजकीय तितली का चयन करेगी, तब उसके संरक्षण के प्रति सामाजिक प्रतिबद्धता भी कहीं अधिक मजबूत होगी।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर