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GPM; प्रशासन की चुप्पी या ‘सिस्टमेटिक शील्ड’?बसंतपुर जमीन मामला गरमाया: घोटाले के आरोपों के बीच FIR नहीं—किसे बचा रहा है सिस्टम?

-बसंतपुर जमीन कांड Part-3
जमकर हुआ लेनदेन, फाइलों में दफन आपराधिक मामला”: जीवन सिंह राठौर कनेक्शन पर प्रशासन फिर कटघरे में,

अब तक का सबसे बड़ा सवाल—अपराध हुआ, लेकिन प्रकरण क्यों नहीं?
बसंतपुर की “बड़े झाड़ जंगल मद” जमीन से जुड़ा मामला अब तीसरी कड़ी में और ज्यादा विस्फोटक होता नजर आ रहा है। जिस प्रकरण में अधिकार अभिलेख में कूट रचना, फर्जी प्रविष्टि और शासकीय जमीन को निजी बनाने जैसे गंभीर तथ्य सामने आए—वह साफ तौर पर आपराधिक प्रकरण बनने योग्य था, लेकिन आज तक उस दिशा में निर्णायक कदम नहीं उठाया गया।
सवाल सीधा है—क्या अपराध को जानबूझकर प्रशासनिक फाइलों में दफन किया गया?
सूत्रों का दावा: कागजों में लाखों, जमीन पर ‘जमकर हुआ लेनदेन’
पूरे घटनाक्रम में दस्तावेजों में भले ही सीमित राशि दर्शाई गई हो, लेकिन सूत्रों के हवाले से लगातार यह बात सामने आ रही है कि जमीन का वास्तविक सौदा कहीं अधिक रकम में हुआ।


यानी एक तरफ कागजों में वैधता का दिखावा, तो दूसरी तरफ जमीन पर बड़े पैमाने पर लेनदेन—यही इस पूरे खेल का असली चेहरा बताया जा रहा है।
जीवन सिंह राठौर—पूरे ‘मॉडल’ का केंद्रीय चेहरा
इस पूरी कहानी में जीवन सिंह राठौर एक केंद्रीय कड़ी के रूप में उभरते हैं। पहली खरीदी, फिर पत्नी को दान, और उसके बाद तीसरे पक्ष को बिक्री—यह पूरी चेन एक तय रणनीति की तरह दिखाई देती है।
सूत्रों के मुताबिक, अधिकार अभिलेख में कथित बदलाव के बाद ही यह पूरा ‘मॉडल’ लागू किया गया।
अधिकार अभिलेख में कूट रचना: सिस्टम के भीतर से ही खेल?


मामले का सबसे गंभीर पहलू वही है—अधिकार अभिलेख में फर्जी प्रविष्टि।
1 से 99 तक दर्ज रिकॉर्ड में “100 नंबर” जोड़कर नई एंट्री करना कोई तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर से की गई कूट रचना का संकेत देता है।
क्योंकि ऐसा बदलाव बिना विभागीय पहुंच और संरक्षण के संभव नहीं माना जाता।
जहां एफआईआर बनती थी, वहां नोटिंग चलती रही?
इतने गंभीर तथ्यों के सामने आने के बाद सामान्य प्रक्रिया यह होती है कि मामला सीधे आपराधिक प्रकरण में दर्ज हो।
लेकिन यहां उल्टा हुआ—फाइलें चलती रहीं, नोटिंग होती रही, लेकिन एफआईआर नहीं हुई।
यह स्थिति खुद प्रशासनिक नीयत पर सवाल खड़ा करती है।
नामांतरण निरस्त, फिर बहाल—फैसले किसके प्रभाव में?
शिकायत के बाद नामांतरण निरस्त किया गया था, जो यह दर्शाता है कि गड़बड़ी स्वीकार की गई थी।
लेकिन बाद में उसी जमीन का नामांतरण फिर से कर दिया गया—यहीं से पूरे मामले की दिशा बदलती नजर आती है।
क्या यह सिर्फ प्रक्रिया थी या किसी प्रभाव का परिणाम—यह अब भी अनुत्तरित है।
तहसीलदार अविनाश कुजूर की भूमिका फिर चर्चा में
हालांकि इस कड़ी में फोकस लेनदेन और आपराधिक पहलू पर है, लेकिन नामांतरण दोबारा किए जाने में तहसीलदार अविनाश कुजूर की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जब मामला पहले ही संदिग्ध था, तो दोबारा स्वीकृति किस आधार पर दी गई—यह अब भी बड़ा सवाल बना हुआ है।
प्रशासन की चुप्पी या ‘सिस्टमेटिक शील्ड’?
तीन साल तक मामला आपराधिक प्रकरण में नहीं बदलना, और लगातार प्रशासनिक स्तर पर ही सीमित रहना—यह सिर्फ देरी नहीं, बल्कि संभावित संरक्षण की ओर इशारा करता है।
क्या कार्रवाई करने पर अंदर के चेहरे सामने आ जाएंगे?
क्या इसी डर से मामला रोका गया?
कौन बच रहा है—व्यक्ति या पूरा तंत्र?
अब सवाल सिर्फ जीवन सिंह राठौर या किसी एक अधिकारी का नहीं रहा।
यह मामला इस दिशा में इशारा कर रहा है कि क्या पूरा तंत्र ही किसी स्तर पर इस खेल में शामिल या मौन समर्थन में है?
बसंतपुर कांड बना मिसाल—कैसे ‘कागजों का खेल’ जमीन पर हकीकत बनता है
यह प्रकरण अब एक केस स्टडी बन चुका है कि कैसे
शासकीय जमीन → फर्जी प्रविष्टि → दान → बिक्री → नामांतरण
की पूरी प्रक्रिया के जरिए जमीन को कागजों में बदलकर बाजार में उतार दिया जाता है।
अब आखिरी सवाल—कार्रवाई या फिर हमेशा की तरह खामोशी?
तीन कड़ियों में सामने आए तथ्यों के बाद अब जनता सिर्फ एक जवाब चाहती है—
क्या इस मामले में आपराधिक प्रकरण दर्ज होगा?
क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?
या फिर ‘जमकर हुए लेनदेन’ की यह कहानी भी फाइलों में हमेशा के लिए दफन कर दी जाएगी?

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