173.41 करोड़ का आईटीएमएस,फिर भी अपराधियों की पहचान में कैमरे बेअसर,बंद और आउट ऑफ फोकस कैमरों से पुलिस को नहीं मिल रही मदद

बाल संप्रेषण गृह हत्याकांड समेत कई मामलों में निजी सीसीटीवी फुटेज का सहारा
बिलासपुर। शहर में सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए 173.41 करोड़ रुपए की लागत से लागू किया गया इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम आईटीएमएस पुलिस के लिए पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हो पा रहा है। शहर के कई प्रमुख चौक-चौराहों पर लगे कैमरे लंबे समय से बंद हैं, जबकि कई स्थानों पर कैमरों का फोकस खराब होने के कारण रिकॉर्ड होने वाली तस्वीरों से चेहरा और वाहन नंबर स्पष्ट नजर नहीं आते।स्थिति यह है कि अपराध की घटनाओं की जांच के दौरान पुलिस को आईटीएमएस कैमरों से अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है। हाल ही में बाल संप्रेषण गृह में हुई हत्या सहित शहर में हुई चोरी और अन्य घटनाओं की जांच में भी पुलिस को कई स्थानों पर निजी प्रतिष्ठानों और घरों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज पर निर्भर रहना पड़ा।
46 चौराहों पर 526 कैमरे, फिर भी निगरानी अधूरी
आईटीएमएस के तहत शहर के 46 प्रमुख चौक-चौराहों पर 526 कैमरे लगाए गए हैं। इसका उद्देश्य यातायात उल्लंघनों की निगरानी के साथ-साथ अपराध नियंत्रण और घटनाओं के बाद आरोपियों की पहचान में पुलिस की मदद करना है। लेकिन कैमरों के बंद रहने और तकनीकी खामियों के कारण सिस्टम की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
सरकंडा क्षेत्र के कई तिराहों और चौराहों पर अधिकांश कैमरे लंबे समय से सक्रिय नहीं बताए जा रहे हैं। यहां फिलहाल मुख्य रूप से एएनपीआर कैमरों के काम करने की जानकारी है।
शहर के अग्रसेन चौक, सत्यम चौक, नेहरू चौक, मंगला चौक, महाराणा चौक, इंदिरा गांधी चौक, राजीव गांधी चौक, भारतीय नगर चौक, सिटी मॉल, रेलवे स्टेशन, गुरुनानक चौक और दयालबंद सहित कई स्थानों पर कैमरों के फोकस को लेकर समस्या बताई गई है।
एसीसीयू को निजी सीसीटीवी का सहारा
आईटीएमएस कैमरों से स्पष्ट फुटेज नहीं मिलने के कारण एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट की जांच कई बार निजी सीसीटीवी कैमरों पर निर्भर हो जाती है। पुलिस को किसी घटना के बाद संबंधित मार्ग पर स्थित दुकानों, मकानों और प्रतिष्ठानों में लगे कैमरों की फुटेज जुटानी पड़ती है।
विशेषकर रात के समय यह समस्या और बढ़ जाती है। पुलिस विभाग ने त्रिनेत्र सेवा समिति से नाइट विजन कैमरे लगाने की मांग भी की है, ताकि रात में होने वाली घटनाओं की स्पष्ट फुटेज उपलब्ध हो सके और आरोपियों की पहचान आसान हो।
एसएसपी ने निगम को लिखा पत्र
एएसपी पंकज पटेल के मुताबिक, एसीसीयू से बंद और खराब फोकस वाले कैमरों की जानकारी मांगी गई है। कैमरों को दुरुस्त कराने के लिए एसएसपी से चर्चा हुई है और उन्होंने नगर निगम को पत्र भी लिखा है।
पुलिस का मानना है कि आईटीएमएस के कैमरों को पूरी तरह सक्रिय करने और नियमित तकनीकी रखरखाव से अपराधों की जांच में काफी मदद मिल सकती है।
ई-वाहूनों की हरी नंबर प्लेट भी बनी चुनौती,कैमरों में नंबर स्पष्ट नहीं दिखने से चोरी, लूट और हिट एंड रन की जांच में परेशानी,ई-चालान में भी दिक्कत
शहर में आईटीएमएस कैमरों की तकनीकी समस्या के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों की हरी नंबर प्लेट भी पुलिस और यातायात विभाग के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। ई-रिक्शा, ई-ऑटो, ई-मोपेड और ई-कार की हरे बैकग्राउंड पर काले अक्षरों वाली नंबर प्लेट कई कैमरों में स्पष्ट कैप्चर नहीं हो पाती। इससे अपराध या सड़क दुर्घटना की स्थिति में वाहन की पहचान मुश्किल हो जाती है।
बिलासपुर जिले में 20 हजार से अधिक ई-रिक्शा और अन्य ई-वाहन पंजीकृत बताए जा रहे हैं। इसके अलावा करीब 3 हजार गैर-पंजीकृत और अवैध ई-रिक्शा भी सड़कों पर चलने की जानकारी है। ऐसे में इन वाहनों की निगरानी और पहचान पुलिस के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है।
स्थानीय स्तर पर यूनिक नंबर देने का सुझाव
ई-वाहनों की पहचान आसान बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर यूनिक या सीरियल नंबर देने का सुझाव दिया गया है। इन्हें वाहन के आगे और पीछे बड़े अक्षरों में प्रदर्शित किया जा सकता है, ताकि सामान्य सीसीटीवी कैमरे भी उन्हें आसानी से कैप्चर कर सकें।
इसके साथ ही परिवहन विभाग, नगर निगम और यातायात पुलिस के बीच संयुक्त डिजिटल डेटाबेस तैयार करने तथा ई-रिक्शा के लिए निर्धारित रूट तय करने का सुझाव भी दिया गया है।
केंद्र के नियम में बदलाव संभव नहीं
एएसपी ट्रैफिक रामगोपाल करियारे के मुताबिक, ई-वाहनों की नंबर प्लेट का साइज बढ़ाने के लिए परिवहन विभाग को उच्च स्तर से अनुमति लेने के लिए कहा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हरे रंग की नंबर प्लेट का प्रावधान केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित है और स्थानीय स्तर पर उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
दोहरी चुनौती,कैमरे भी कमजोर, नबर प्लॅट भी
बिलासपुर में पुलिस के सामने एक साथ दो तकनीकी चुनौतियां खड़ी हैं। एक ओर करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए आईटीएमएस कैमरों में कई कैमरे बंद या खराब फोकस वाले हैं, वहीं दूसरी ओर ई-वाहनों की नंबर प्लेट कैमरों में स्पष्ट कैप्चर नहीं हो पा रही है। ऐसे में शहर की हाईटेक निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य तभी पूरी तरह हासिल हो सकेगा, जब कैमरों का नियमित रखरखाव, बेहतर नाइट विजन और वाहन पहचान प्रणाली को मजबूत किया जाए।
नंबर स्पष्ट नहीं तो जांच में ये दिक्कतें
अपराध में इस्तेमाल वाहन की पहचानः चोरी, लूट, स्नेचिंग जैसी घटनाओं में यदि ई-वाहन का इस्तेमाल होता है तो कैमरे में नंबर स्पष्ट नहीं आने से आरोपी तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
हिट एंड रनः दुर्घटना के बाद भागने वाले ई-वाहन और चालक की पहचान में परेशानी आती है।
ई-चालानः ओवरस्पीड, रॉन्ग साइड ड्राइविंग और रेड लाइट जंप जैसे मामलों में एएनपीआर कैमरे नंबर प्लेट स्पष्ट नहीं पढ़ पाते, जिससे ऑटोमैटिक ई-चालान की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
अवैध ई-रिक्शाः बिना पंजीयन चल रहे ई-रिक्शा की पहचान और निगरानी भी मुश्किल बनी हुई है।