बढ़ता तापमान, बदलता मानसून पहाड़ों की ओर उड़ रहीं तितलियां,नम धरती और सुरक्षित आवास की खोज में बदल रहीं ठिकाना

बिलासपुर- बढ़ रहा तापमान, बदल रहा मानसून का स्वरूप। नई जगह और सुरक्षित आवास की खोज में तितलियां पर्वतीय क्षेत्रों की ओर उड़ान भर रहीं हैं, जहां तापमान अनुकूल है और पोषक पौधे एवं वृक्ष पर्याप्त है।तितलियां केवल सुंदरता का प्रतीक नहीं हैं बल्कि वह पर्यावरण में हो रहे बदलाव की संवेदनशील जैव- सूचक भी हैं। तापमान, वर्षा, वनस्पतियों की उपलब्धता और मौसम चक्र में बदलाव का प्रभाव तितलियों में अपेक्षाकृत जल्द नजर आता है। तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील तितलियां अब स्थान बदल रहीं हैं क्योंकि प्रदेश का सामान्य तापमान तितलियों के अनुकूल नहीं रहा।

दरअसल तितलियां अपने शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए पूरी तरह बाहरी वातावरण पर निर्भर होती हैं। तापमान बहुत कम होने पर गतिविधियां कम हो जातीं हैं, तो अत्यधिक गर्मी शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं कर पाता। ऐसी स्थितियों में मैदानी क्षेत्र से पहाड़ों की ओर, निचले अक्षांशों से ऊंचे अक्षांशों की ओर, या फिर ऐसे क्षेत्र की खोज कर रहीं हैं तितलियां, जहां का तापमान और नमी उनके लिए अनुकूल हो।
अध्ययन एवं अनुसंधान में यह खुलासा हुआ है कि जिन तितलियों की ताप नियमन क्षमता कमजोर है, उनमें ऊंचाई की ओर उड़ान अधिक स्पष्ट है। कई तितलियां ऐसी भी मिलीं, जो अनुकूलित होने की बजाय भौगोलिक वितरण बदलकर जलवायु परिवर्तन का सामना कर रहीं हैं। इनमें छोटी और गहरे रंगों वाली तितलियां मुख्य हैं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि यह जलवायु परिवर्तन के प्रति समान रूप से संवेदनशील नहीं हैं। शरीर और पंखों का आकार, रंग और ताप नियमन क्षमता अधिक सहनशीलता को प्रभावित करता है।

तापमान ही नहीं, यह खतरे भी…
जलवायु परिवर्तन भले ही महत्वपूर्ण हो लेकिन कृषि क्षेत्र का विस्तार, कीटनाशकों का अनियंत्रित छिड़काव, घास भूमियों का कम होना, वनों का विखंडन, खनन क्षेत्र का विस्तार, आर्द्र भूमि का घटता रकबा और स्थानीय पौधों तथा वृक्षों की कमी जैसी दिक्कतें भी तितलियों के प्राकृतिक आवास को लगातार प्रभावित कर रहीं हैं। तितलियों का बदलता वितरण क्षेत्र केवल एक प्रजाति का मामला नहीं है बल्कि पूरे पारिस्थितिकी नेटवर्क में संभावित बदलाव का प्रतीक है।

चाहिए नई संरक्षण नीति
जलवायु परिवर्तन के दौर में तितलियों के संरक्षण के लिए नई नीति को अब जरूरी माना जा रहा है। इसमें प्राकृतिक आवास, घास भूमि, आर्द्र भूमि और स्थानीय पौधों को बचाने की गंभीर कोशिश करनी होगी। विखंडित आवास के बीच ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण तथा दीर्घकालिक निगरानी की व्यवस्था सुदृढ़ करनी होगी ताकि यह मालूम हो सके कि किस क्षेत्र में, कौन सी तितली, कब दिखाई देती है? किस पौधे पर निर्भर हैं? और वितरण क्षेत्र में साल-दर-साल क्या बदलाव हो रहा है?

बदलते जलवायु का महत्वपूर्ण जैव- संकेत
फॉरेस्ट्री साइंटिस्ट
अजीत विलियम्स का कहना है कि
तितलियों का मैदानी क्षेत्रों से ठंडे और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर जाना बदलते जलवायु का महत्वपूर्ण जैव-संकेत है। तापमान और नमी के प्रति संवेदनशील होने के कारण तितलियां पर्यावरणीय बदलावों का प्रभाव जल्दी दर्शाती हैं। बढ़ते तापमान के साथ स्थानीय पौधों की कमी, वनों का विखंडन, घासभूमि-आर्द्रभूमि का क्षरण और कीटनाशकों का अनियंत्रित उपयोग भी तितलियों के अस्तित्व के लिए चुनौती हैं। तितली संरक्षण के लिए उनके प्राकृतिक आवास और पोषक पौधों को बचाने के साथ ग्रीन कॉरिडोर और नियमित वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है।