कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर में मनाया गया भारत विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस

राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई की पहल
बिलासपुर, 14 अगस्त 2026। बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर में आज राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के तत्वावधान में भारत विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य वर्ष 1947 में हुए भारत विभाजन के दौरान विस्थापन, पीड़ा, हिंसा और असंख्य लोगों के संघर्ष एवं बलिदान को स्मरण करते हुए युवा पीढ़ी को इतिहास के इस मार्मिक अध्याय से परिचित कराना तथा सामाजिक सद्भाव, एकता और भाईचारे का संदेश देना था।

कार्यक्रम पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के कार्यक्रम अधिकारी अजीत विलियम्स ने कहा कि 14 अगस्त केवल स्वतंत्रता की पूर्व संध्या नहीं, बल्कि इतिहास के उस दर्दनाक अध्याय को स्मरण करने का दिन भी है, जिसने लाखों परिवारों के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। विभाजन के दौरान असंख्य लोगों को अपना घर, जमीन-जायदाद और जन्मभूमि छोड़कर अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इस दिवस को मनाने का उद्देश्य अतीत के घावों को कुरेदना नहीं, बल्कि इतिहास से सीख लेकर ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकना और राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा सामाजिक समरसता को और मजबूत करना है।
इस अवसर पर डॉ. गीत शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, बिलासपुर ने अपने उद्बोधन में कहा कि 14 अगस्त हमारे लिए केवल आजादी से पहले की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जिसकी स्मृति करोड़ों भारतीयों के हृदय में विभाजन का दर्द संजोए हुए है। उन्होंने कहा कि विभाजन ने केवल देश की भौगोलिक सीमाओं को नहीं बदला, बल्कि लाखों परिवारों के सामाजिक और भावनात्मक जीवन को भी प्रभावित किया। हमें उन सभी लोगों की पीड़ा और साहस को स्मरण करते हुए वर्तमान पीढ़ी को मानवता, सहिष्णुता और आपसी सम्मान का संदेश देना चाहिए।
वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. अजय प्रकाश अग्रवाल ने कहा कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि वह वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक भी है। भारत विभाजन की विभीषिका हमें यह सिखाती है कि सामाजिक वैमनस्य और नफरत का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना को अपने जीवन का आधार बनाएं तथा समाज में सद्भाव और भाईचारे के वातावरण को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. एन.के. चौरे, अधिष्ठाता, कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज का दिन अपने उन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए देश के वर्तमान स्वरूप की नींव रखी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता हमें अनेक बलिदानों के बाद प्राप्त हुई है और इसकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। विभाजन की त्रासदी हमें यह संदेश देती है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति होती है।
डॉ. चौरे ने विद्यार्थियों से कहा कि वे इतिहास को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखें, बल्कि उसके मूल संदेश को अपने आचरण में उतारें। भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है और विविधताओं के बीच एकता ही भारतीय राष्ट्र की पहचान है। उन्होंने युवाओं से सामाजिक समरसता, आपसी सहयोग, संवेदनशीलता और राष्ट्रभक्ति की भावना को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
दो मिनट का मौन रखकर दी गई श्रद्धांजलि
कार्यक्रम के दौरान भारत विभाजन की विभीषिका में अपने प्राण गंवाने वाले असंख्य निर्दोष नागरिकों तथा विस्थापन और संघर्ष की पीड़ा झेलने वाले लोगों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उपस्थित अतिथियों, प्राध्यापकों एवं छात्र-छात्राओं ने मौन धारण कर उन सभी ज्ञात-अज्ञात पीड़ितों को नमन किया, जिनकी पीड़ा और साहस भारतीय इतिहास का कभी न भुलाया जा सकने वाला अध्याय है।
इस अवसर पर विभाजन के दौरान विस्थापित हुए परिवारों की पीड़ा, संघर्ष और साहस को स्मरण किया गया। विद्यार्थियों ने इतिहास की इस त्रासद घटना से सीख लेते हुए राष्ट्रीय एकता, अखंडता, शांति और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के दौरान यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि विभाजन की विभीषिका को याद करना किसी समुदाय के प्रति वैमनस्य पैदा करना नहीं, बल्कि मानवता के पक्ष में खड़े होकर इतिहास से सीख लेना है। अतीत की पीड़ा को स्मृति में रखते हुए वर्तमान में प्रेम, विश्वास और भाईचारे का वातावरण निर्मित करना ही इस दिवस की वास्तविक सार्थकता है। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र की एकता, अखंडता और सामाजिक समरसता को बनाए रखने के संकल्प के साथ हुआ। वक्ताओं ने कहा कि विभाजन की त्रासदी से मिली सबसे बड़ी सीख यही है कि भारत की विविधता में एकता को अक्षुण्ण रखना और आने वाली पीढ़ियों को शांतिपूर्ण, समरस एवं सशक्त भारत के निर्माण के लिए प्रेरित करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।